रविवार, 6 नवंबर 2011

शीशये दिल पर हमारे

शीशये-दिल पर हमारे कौन-सा वह अक्स था
जो हमें बहका गया और दर्पण मौन था


अर्थ ने बाहें पसारी शब्द सीमित हो गये
सम्भावना के घर नये संदर्भ जीवित हो गये
पास आओ तुम कभी किसने कहा क्या सत्य था
कौन ये बतला गया स्वर निमंत्रण मौन था
    और दर्पण मौन था


उतप्त हो सागर सदा बादल बना गलता रहा
भाप बनना फिर पिघलना सिलसिला चलता रहा
एक दूजे को समर्पित हो गए क्या फ़र्क था
वक्त को बहला गया पर समर्पण मौन था
  और दर्पण मौन था


आँख जब देखे वही हो स्वप्न जो मैंने बुना हो
हो कभी संवाद ऐसे बिन कहे तुमने सुना हो
हम समझ पाये नहीं थे कौन सा वह दर्द था
जो हमें तड़पा गया और तर्पण मौन था
     और दर्पण मौन था


तुम सभी में, सब तुम्हीं में, है नहीं कोई अंदेशा
भेज देते हो हवा के हाथ प्रिय सौरभ-संदेशा
खुशबुयें अर्पित बहारों को हुई क्या कर्ज़ था
पाषाण भी पिघला गया और अर्पण मौन था
     और दर्पण मौन था


शीशये दिल पर हमारे कौन-सा वह अक्स था
जो हमें बहका गया और दर्पण मौन था

1 टिप्पणी:

  1. प्रेम में सराबोर होकर बहकने वाले भी बहके नहीं कहलाते। बहुत सुंदर कविता के लिए बधाई स्वीकारें॥

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