गुरुवार, 10 नवंबर 2011

नज़र से नज़रें मिले तो

नज़र से नज़रें मिले तो
बाँच लेना मौन मेरा


लाज के उस एक झीने आवरण से
बिन कहे सब कुछ बताना
प्यार का पहला चरण है
और यदि नज़रें झुकें तो समझ जाना
अनकहा ये समर्पण है
मौन का निःशब्द क्षण है


आँख की गहराइयाँ भी झील से ज़्यादा बड़ी है
तुम उतर पाए अगर तो
प्यार का मोती मिलेगा
जो अभी तन अनछुआ है
और बिन मांगी दुआ है
जो उतर आई किनारों पर
उस सुनहरी साँझ का जलता हुआ पहला दिया है


तुम अगर पहचान पाये
तुम अगर ये जान पाये
इस समुन्दर में यहाँ सीपी बहुत हैं
किन्तु सबमें तो वही मोती नहीं बनता
चितवनों से दे निमंत्रण जो उतर जाये हृदय में
मौन हो जाता मुखर है
मौन का निःशब्द स्वर है


नज़र से नज़रें मिलें तो
बाँच लेना मौन मेरा

1 टिप्पणी:

  1. मौन की भाषा तो प्रेमी हृदयी ही पढ सकता है। भावपूर्ण कविता के लिए बधाई।

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