मंगलवार, 27 सितंबर 2011


तुम नहीं मिले कहीं


तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे
पत्थरों में देवता हम तराशते रहे


तुम बचाओगे हमें हर विपत्ति-व्याधि में
साथ ही रहोगे तुम आदि से अनादि में
रूप-रंग-गंध का कुछ पता नहीं अभी
हम तुम्हें क्ल्पना में सवांरते रहे
तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे


पर्वतों की ओट से प्रभात बन के ढल रहे
तुम नदी की गोद में प्रवाह बन मचल रहे
घात में प्रतिघात में भवंर-चक्रवात में
जिन्दगी की नाव घाट पर उतारते रहे
तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे


अंधकार में तुम्हीं प्रकाश-पुंज से खड़े
युद्धभूमि में तुम्हीं शूरवीर से लड़े
शांति में अशांति में भ्रमित-भूल भ्रांति में
हम तुम्हें प्रार्थना में पुकारते रहे
तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे


भोर के प्रकाश में व्योम-व्योम छा गए
सो गई किरण को तुम चाँदनी उढ़ा गए
फूल-फूल में तुम्हीं समा गए सुगंध से
खार भी बने तो भूल को सुधारते रहे
तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे


तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे
पत्थरों में देवता हम तराशते रहे॥


 

1 टिप्पणी:

  1. तुम बचाओगे हमें हर विपत्ति-व्याधि में
    साथ ही रहोगे तुम आदि से अनादि में

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। पता नहीं क्यों नीरज जी की कविताएं याद आ गईं इसे पढ़ते हुए॥

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