शनिवार, 18 फ़रवरी 2012


मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है


है वही धड़कन तुम्हारे भी हृदय में
किन्तु मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है


शब्द निकले हैं सफ़र पर अर्थ अपना ढूँढ़ लाने
चल पड़े मन्तव्य ले गंतव्य उसका आज़माने
अनकही बातें भी अक्सर शीत कर देतीं शिरायें
ये जिया अहसास है अभिव्यक्ति का बंधन नहीं है
  और मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है


हमारी आँख का पानी तुम्हारी आँख धोये ये कभी होता नहीं है
ज्यों किसी की नींद कोई दूसरा सोता नहीं है
उमड़ता बादल भले बरसे कहीं बरसात बनकर
प्रेम की पेंगे बढ़ाता मन चला सावन नहीं है
  और मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है


जो स्वयं बैठे अहम्‌ की कुंडली में बांध ली है लौह जैसी श्रंखलायें
हो गए पत्थर सभी जज़्बात जिनके वे पता संवेदना का क्या बतायें
रूबरू जो कर न पाये सूरतों को आइने में
और कुछ होगा मगर दर्पण नहीं है
  और मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है


है कहाँ आशीष देते हाथ जो मन का कलुष संताप धोयें
अश्रु से गीली हुई माटी में आकर शांति के सुख के कभी कुछ बीज बोये
आज शिष्टाचार के लगते मुखौटे हैं असीमित प्यार के किरदार छोटे
और मन का मान रखने सहज अपनापन नहीं है
  और मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है


प्रार्थना अंतरमुखी अनुभूति मन की आत्मा का अर्थवाची आचमन है
शब्द परिभाषित नहीं करते इसे, वे सहज संवेदना का संकलन है
हो गए पाषाण राधा-कृष्ण भी अब रास-रस से युक्त वृंदावन नहीं है
अंग आभूषण सभी पानी चढ़े हैं हर चमकती चीज़ तो कंचन नहीं है
  और मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है



है वही धड़कन तुम्हारे भी हृदय में

1 टिप्पणी:

  1. शब्द निकले हैं सफ़र पर अर्थ अपना ढूँढ़ लाने.....
    बहुत सुंदर प्रयोग.. बधाई स्वीकारें॥

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